02 अक्तूबर 2017

मेरी नजर से बूढी डायरी और अशोक जमनानी :)

करीब 2012 से मैं अशोक जमनानी जी से जुड़ा हुआ हूँ जमनानी जी के लेखन से मैं बहुत प्रभावित हूँ उनके अपार स्नेह के कारण ही उनके बारे में लिखना संभव हो पाया है 2013 में मुझे आशोज जमनानी जी की दो किताबें प्राप्त हुई .....बूढी डायरी और खम्मा खम्मा
बूढी डायरी जबलपुर - भेड़ाघाट मार्ग पर एक छोटा सा गाँव है तेवर इस गाँव को देखकर कोई सोच भी नहीं सकता की ये पुराणों में वर्णित सुप्रसिद्ध नगरी त्रिपुरी है आज तेवर में एक बावड़ी ,कुछ प्रतिमाएं ,कुछ मूर्तियां और कुछ अवशेष प्राचीन वैभव की कहानी सुनाते है लेकिन गाँव में रहने वाले बहुत से लोगो को पता भी नहीं है की उनके गाँव और घरों के नीचे हजारों वर्ष पुरानी गौरव गाथाएं छुपी हुई है ...अशोक जी से काफी लम्बे समय से परिचय है......बहुत ही संजीदा लेखक है !
बूढी डायरी की कहानी एक .... एक भौतिकवादी जमींदार का पौत्र है जिसके पिता एक विरक्त, आदर्शवादी व्यक्ति हैं जिनका जीवन गांधीवादी मूल्यों से जीने में बीता है। यह गांधीवादी पिता अपनी आँखों के सामने विवश हो देखता है कि किस प्रकार उसका पुत्र उसके रास्तों को न चुनकर अपने दादा की तरह जमींदारी ठाठ-बाट और भौतिकवादी मूल्यों पर आधारित जीवन जीता है। पिता पुत्र को रोकने का प्रयास नहीं करता, केवल गांधीवादी उपायों से प्रायश्चित करता है। पूरे उपन्यास में पिता की उपस्थिति एक साये की तरह है। वह अनीति देख तो सकता है, पर अनीति को होने से रोक नहीं सकता। यहाँ हम किसे याद करें? भीष्म को? या धृतराष्ट्र को?
किंतु नायक सत्य का जीवन विवाह के बाद धीरे-धीरे नया मोड़ लेता है। नायिका “धारा” सत्य के जीवन में संस्कृति और का कला का प्रवेश है। धारा के आने के बाद नायक और पिता के संबंध रोचक परिवर्तनों से गुजरते हैं, पर एक औसत राजपूत परिवार की तरह, पिता-पुत्र के बीच न्यूनतम दूरी मिटती नहीं।
बूढ़ी डायरी एक शापित समाज की कहानी कहती है। वह शापित समाज जिसे कभी समृद्धि और वैभव का वरदान प्राप्त था। वह समाज जिसे शाप मिला है कि वह ने केवल अपने वैभव को विवश अपने समक्ष लुटता देखे बल्कि स्वयं उस लूट में लुटेरों का बढ़-चढ़कर साथ भी दे। यदि यह सत्य है कि हमारे समाज पर ऐसा कोइ शाप है, तो विश्वास कीजिये “बूढ़ी डायरी” जैसे प्रयास एक दिन इसी समाज के लिये वरदान सिद्ध होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं वृद्ध पूरे एक वर्ष तक हर रविवार को अपनी डायरी के माध्यम से अपनी स्वर्गवासी पत्नी को संबोधित करता है. वृद्ध की लेखनी में एक विशेष प्रकार का मर्म उत्पन होता है जिसकी आत्मीयता को पाठक अपने हृदय में अनुभव कर सकता है.
इस कहानी का बूढ़ा नायक दीवाली पर अपना पुराना बक्सा खोलता है और उसमें रखा पुराना सामान देखकर उसे अपने बीते वक्त की याद आ जाती है तब वो यह ग़ज़ल अपनी डायरी में लिखता है :-

सोचा था जो बीत गए वो बरस नहीं फिर आएंगे
आज पुराना बक्सा खोला तो देखा सब रक्खे हैं /

फाड़ दिए थे वो सब खत जो मेरे पास पुराने थे
मन का कोना ज़रा टटोला तो देखा सब रक्खे हैं /

यादों के संग बैठ के रोना भूल गया जाने कब से
आंखें शायद बदल गयी हैं आंसू तो सब रक्खे हैं

रातों को जो देर दूर तक साथ चलें वो नहीं कहीं
नींद ही रस्ता भटक गयी है ख्वाब तो सारे रक्खे हैं /

फिर कहने को जी करता है बातें वही पुरानी सब
सुनने वाला कोई नहीं है किस्से तो सब रक्खे हैं /

इस पुस्तक को आज मैंने दूसरी बार पढ़ा तब पुस्तक पर अपने विचार व्यक्त कर रहा हूँ  उनकी ये चमक दूर -दूर तक पहुचे इसके लिए मेरी और से एक बार पुन: अशोक जमनानी जी को ढेरों शुभकामनाएँ......!!

पुस्तक  –  बूढ़ी डायरी
लेखक --  अशोक जमनानी
पुस्तक का मूल्य – 250/
प्रकाशक - तेज प्रकाशन ९८ दरियागंज नई दिल्ली -110002

पुस्तक प्राप्ति हेतु लेखक से सीधा सम्पर्क किया जा सकता है।
रचनाकार का पता :-
अशोक जमनानी
हजूरी सात रास्ता
होशंगाबाद ( मध्य प्रदेश )

-- संजय भास्कर 

06 सितंबर 2017

......पीढ़ियाँ आती रहेंगी :))


पीढ़ियाँ आती रहेंगी
और जाती रहेंगी
हमेशा कि तरह
अपनी जिम्मेदारियाँ निभाती रहेंगी
अपनी पूरी ज़िंदगी
कुछ जिम्मेदारियाँ पूरी हो जाती है
इस पीढ़ी में
जो रह जाती जाएंगी
उसे छोड़ जाएंगी
आने वाली पीढ़ियों पर
और वह पीढ़ी
उन्हीं जिम्मेदारियों को
निभाते -निभाते बिता देगी सारी उम्र
ऐसे ही बीत जाएंगी
ये ज़िंदगी
क्योंकि पीढ़ियाँ आती रहेगी
पीढ़ियाँ जाती रहेंगी.......!!

- संजय भास्कर

सभी साथियों को मेरा नमस्कार कुछ दिनों से व्यस्ताएं बहुत बढ़ गई है इन्ही व्यस्ताओं के कारण ब्लॉग को समय नहीं दे पा रहा हूँ ज़िंदगी की भागमभाग से कुछ समय बचाकर आज आप सभी के समक्ष उपस्थित हूँ  !

17 अगस्त 2017

साहित्य जगत के लिए बड़ी क्षति कवि चंद्रकांत देवताले का जाना :)

एक बड़ा कवि, अद्भुत संवेदना का स्रोत और ज़िन्दगी का जानकार हमारे बीच से चला गया। ऐसा कवि होना वाकई कठिन होता है जो प्रेम के लिए,मनुष्यता के लिए आज़ादी और जनतंत्र के लिए, स्त्रियों, दलितों, ग़रीबों के साथ संघर्ष में शामिल और हमेशा समर्पित होता रहा है। कविता उसकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा गहना था।वह
अकविता के शोरगुल के बीच से आया था। लगभग चाकुओं जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता था। हड्डियों में छिपे ज्वर को पहचानता था। वह लिखता ही तो रहा जीवन भर। लिखना ही उसकी आत्मा का असली ताप था। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हिंदी के कवि चंद्रकांत देवताले मध्य प्रदेश के बैतूल के जौलखेड़ा में 7 नवंबर 1936 में जन्मे देवताले 1960 के दशक में अकविता आंदोलन के साथ उभरे थे हिंदी में एमए करने के बाद उन्होंने
मुक्तिबोध पर पीएचडी लकड़बग्घा हंस रहा है' कविता संग्रह से चर्चित हुए देवताले इंदौर के एक कॉलेज से रिटायर होकर स्वतंत्र लेखन कर रहे दो लड़कियों के पिता चंद्रकांत देवताले नहीं रहे  !
बहुत समय पहले कविता कोष पर देवताले जी एक कविता पढ़ी थी दो लड़कियों का पिता होने से / और बेटी के घर से लौटना /  उसकी कुछ पंक्तियाँ साँझा कर रहा हूँ

दो लड़कियों का पिता होने से

पपीते के पेड़ की तरह मेरी पत्नी
मैं पिता हूँ दो चिड़ियाओं का
जो चोंच में धान के कनके दबाए
पपीते की गोद में बैठी हैं

सिर्फ बेटियों का पिता होने से
कितनी हया भर जाती है शब्दों में
मेरे देश में होता तो है ऐसा
कि फिर धरती को बाँचती हैं
पिता की कवि-आँखें...

बेटियों को गुड़ियों की तरह
गोद में खिलाते हैं हाथ
बेटियों का भविष्य सोच
बादलों से भर जाता है
कवि का हृदय,

एक सुबह
पहाड़-सी दिखती हैं बेटियाँ
कलेजा कवि का चट्टान-सा होकर भी
थर्राता है पत्तियों की तरह

और अचानक
डर जाता है कवि
चिड़ियाओं से
चाहते हुए उन्हें इतना
करते हुए बेहद प्यार।
बेटी के घर से लौटना / चन्द्रकान्त देवताले

बहुत जरूरी है पहुँचना
सामान बाँधते बमुश्किल कहते पिता
बेटी जिद करती
एक दिन और रुक जाओ न पापा
एक दिन

पिता के वजूद को
जैसे आसमान में चाटती
कोई सूखी खुरदरी जुबान
बाहर हँसते हुए कहते कितने दिन तो हुए
सोचते कब तक चलेगा यह सब कुछ
सदियों से बेटियाँ रोकती होंगी पिता को
एक दिन और
और एक दिन डूब जाता होगा पिता का जहाज

वापस लौटते में
बादल बेटी के कहे के घुमड़ते
होती बारीश आँखो से टकराती नमी
भीतर कंठ रूँध जाता थके कबूतर का

सोचता पिता सर्दी और नम हवा से बचते
दुनिया में सबसे कठिन है शायद
बेटी के घर लौटना !

उनका जाना सिर्फ एक बड़े कवि का जाना नहीं है,बहुत से कवियों के अभिभावक का जाना है ऐसे सच्चे निस्स्वार्थ चंद्रकांत देवताले जी को विनम्र नमन !!

-- संजय भास्कर