06 जनवरी 2018

बिखर जायेगा सबकुछ :)


घर से दफ्तर के लिए
निकलते समय रोज छूट
जाता है मेरा लांच बॉक्स और साथ ही
रह जाती है मेरी घड़ी
ये रोज होता हो मेरे साथ और
मुझे लौटना पड़ता है उस गली के
मोड़ से
कई वर्षो से ये आदत नहीं बदल पाया मैं
पर अब तक मैं यह नहीं
समझ पाया
जो कुछ वर्षो से नहीं हो पाया
वह कुछ महीनो में कैसे हो पायेगा
अखबार के माध्यम से की गई
तमाम घोषणाएं
समय बम की तरह लगती है
जो अगर नहीं पूरी हो पाई
तो एक बड़े धमाके के साथ
बिखर जायेगा सबकुछ......!!

हर बार नया साल नयी उम्मीदें, नयी आशा लेकर आता है,
यह नया साल आपके सभी के जीवन में ढेर सारी खुशियां और खूबसूरत समय लेकर आए आप सभी को नए साल की हार्दिक शुभकामनाएं !!

- संजय भास्कर

26 दिसंबर 2017

मेरी नजर से बातों वाली गली और वंदना अवस्थी दुबे :)

कुमारेन्द्र सिंह सेंगर की समीक्षा पढ़ी थी वंदना जी के ब्लॉग पर उत्सुकता जगाती प्रेरक बेबाक समीक्षा मन पढ़ने को आतुर हो गया क्योंकि बात थी बातों वाली गली की ...वंदना दीदी की लेखनी से तो मैं कई वर्षो से प्रभावित हूँ अब बात करते है वंदना दुबे जी का पहला कहानी संग्रह बातों वाली गली की 
लेखिका के पास लेखन का कई वर्षों अनुभव है इसी कारण उन्होंने लेखन में अपने आसपास की चीजों और घटनाओं को बड़ी ही सजगता से अपने संग्रह में सहेजा हैं। संग्रह की प्रत्येक कहानी असाधारण नही है किंतु एक गुण हर रचना में मौजूद है और वो है पठनीयता जो किसी भी कहानी का अनिवार्य तत्व है। 
२० कहानियाँ का संग्रह बातों वाली गली संग्रह की सभी  कहानियाँ ऐसी है जो सीधे मन पर गहरा प्रभाव छोड़तीं और  बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करतीं इन से मैंने अभी तक कुछ ही कहानियों को  पढ़ा है और उन्हें पढ़ कर इस बात का एहसास होता है कि नारी मन की गहराई को बहुत ही बढ़िया तरीके से वन्दना ने समझा है संग्रह की सभी कहानियाँ बहुत बढ़िया हैं लेकिन कुछ कहानियों में नारी मन में उपजी अंतर्वेदना का वन्दना जी ने जिस सूक्ष्मता के साथ चित्रण किया है पहले की बात कुछ और थी पर वर्तमान में कहानियों को नाटकीयता का जमा पहनाने के लिए कई तरह के प्रयोग किये जा रहे हैं, जिनमे मनोवैज्ञानिकता, आधुनिकता का समावेश किया जाता है लेकिन ऐसा वंदना जी की कहानियों में बिलकुल भी नहीं देखने को मिलता है लेखिका ने अपनी सादगी की तरह ही अपनी कहानियों को, अपने पात्रों को सादगी प्रदान की है !
इस संग्रह में 'अहसास' कहानी बहुत ही बढ़िया पढ़ने को मिली जो संयुक्त परिवार में अपने प्रति हो रहे भेदभाव को महसूस कर उसके खिलाफ आवाज उठाने की है संग्रह की कुछ मार्मिक कहानियां हृदय को छू जाने वाली हैं सुंदर कहानियों के संकलन के लिए वन्दना जी को बहुत-बहुत बधाई

एक लम्बे समय से मैं वंदना दीदी के ब्लॉग पढ़ रह हूँ परिकल्पना समारोह लखनऊ में उनसे मिलने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ था और उनसे मिल कर बहुत प्रभावित हुआ संकलन के लिए वन्दना जी को बहुत-बहुत बधाई .......!!

- संजय भास्कर 

12 दिसंबर 2017

..... मेरी देह अधूरी है - संजय भास्कर

मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए सीमा सिंघल यानि मेरी दीदी ( सदा जी जो आवाज है दिल की ) ब्लॉगजगत में सभी परिचित है सदा जी की की रचनाएँ अपने आप में अनूठी है जो सीधे दिल को छूती है हर व्यक्ति की संवेदनाओ को आकृति देती कविताये जीवंत लगती है सदा जी रचनाओं की एक और खासियत इनकी रचनाओ के भाव मन को झकझोर देते है सदा जी की रचनाये मात्र शब्द कौशल की बानगी नहीं है इनकी कविताये सहज होते हुए भी पाठक के चिंतन को कुरेदता है .....!!
मेरी देह अधूरी है सदा दी की लिखी पंक्तियाँ जिसे मैं लगभग 20 बार पढ़ चूका हूँ रचना की पंक्तियाँ आज साँझा कर रहा हूँ उम्मीद है सभी पसंद आएगी ............!!


ये सच है
मेरी देह अधूरी है
पर मेरी आत्‍मा पूरी है
इसमें भी वैसे ही सपने बसते हैं
जैसे किसी सक्षम व्‍यक्ति के होते हैं
मेरे लिये बैसाखियां भी सहारा नहीं बनी
मुझे हांथों से ही सारा काम करना होता है
खाना भी बनाती हूं, चलती भी हूं, इन्‍हीं हांथों से
पर आश्रित नहीं हूं मैं किसी की
मेरी ही तरह स्‍वाभिमानी हैं वो भी साथी मेरे
जो चलते हैं बैसाखियों के सहारे
या अंधेरा है जिनके जीवन में जन्‍म से
फिर भी एक ऊर्जा है जीवन में कुछ कर गुजरने की
जाने क्‍यों लोग हम पर तरस खाते हैं,

सच कहूं तो.... हमें दया से
आगे बढ़ने की प्रेरणा नहीं मिलती ....
हम पल दो पल के लिए दिशाविहीन हो जाते हैं
लोगों के परोपकार से,
पर दूसरे ही पल फिर तैयार हो जाते हैं
ईश्‍वर ने जो हमें अधूरी देह के साथ इस धरा पर भेजा है
हम उसकी कभी शिकायत नहीं करते
आगे बढ़ने का हौसला कायम रखते हैं
निराशा के पलों मे
आंसुओं की बूंदों से आशा के मोती सहेजती
हमारी हथेलियां कुछ कर गुज़रने की चाहत में
स्‍वयं ही पोछती हैं अश्‍को को
मंजिल की तलाश में हमारे कदम
स्‍वयं ही आगे बढ़ते जाते हैं 
हम आधी-अधूरी जिन्‍दगी से
पूरे जीवन को सच्‍चाई से जीते जाते हैं .....!!


मेरी और से एक बार पुन: सदा जी को निरंतर लेखन के लिए को ढेरों शुभकामनाएँ........!!


( C ) संजय भास्कर